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विशेष रिपोर्ट — इंकलाब ज़िंदाबाद: नारा भगत सिंह का नहीं, मगर भगत सिंह ने इसे अमर कर दिया

इंकलाब ज़िंदाबाद…!

यह सिर्फ दो शब्दों का नारा नहीं था।
यह उस दौर की आवाज़ थी, जब हिंदुस्तान अंग्रेज़ी हुकूमत की गुलामी में जकड़ा हुआ था और देश का नौजवान आज़ादी के लिए अपने प्राण तक न्योछावर करने को तैयार था।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि “इंकलाब ज़िंदाबाद” का नारा सबसे पहले भगत सिंह ने नहीं दिया था?

इस नारे के पीछे नाम आता है महान स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, शायर और क्रांतिकारी विचारक मौलाना हसरत मोहानी का। इतिहास के कई स्रोत इस नारे के शुरुआती इस्तेमाल को 1920-21 के दौर से जोड़ते हैं। 1921 में हसरत मोहानी ने अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ पूर्ण स्वतंत्रता यानी “पूर्ण आज़ादी” की मांग भी मजबूती से उठाई थी। उनका “इंकलाब” केवल सत्ता बदलने तक सीमित नहीं था, बल्कि अंग्रेज़ी हुकूमत, सामाजिक असमानता और शोषण के खिलाफ़ व्यापक बदलाव की सोच से जुड़ा था।

आखिर कौन थे हसरत मोहानी?

मौलाना हसरत मोहानी सिर्फ एक शायर नहीं थे। वे पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे। अंग्रेज़ उनकी कलम से भी डरते थे। उनकी पत्रकारिता और ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के कारण उन्हें जेल तक जाना पड़ा। भारत की आज़ादी की लड़ाई में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और बाद में कम्युनिस्ट आंदोलन के शुरुआती नेताओं में भी शामिल रहे। भारत सरकार के आज़ादी के अमृत महोत्सव के डिजिटल अभिलेख में भी उन्हें “इंकलाब ज़िंदाबाद” से जोड़ा गया है।

फिर भगत सिंह का नाम क्यों जुड़ गया?

क्योंकि भगत सिंह ने इस नारे को सिर्फ बोला नहीं, बल्कि इसे क्रांतिकारी आंदोलन की पहचान बना दिया। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधान सभा में बम फेंका। उनका उद्देश्य लोगों की हत्या करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार के दमनकारी कानूनों के खिलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करना और “बहरों को सुनाने” के लिए धमाका करना था।

बम फेंकने के बाद दोनों ने भागने की कोशिश नहीं की। उन्होंने पर्चे फेंके और जोरदार आवाज़ में नारा लगाया—

“इंकलाब ज़िंदाबाद!”

सरकारी और ऐतिहासिक अभिलेखों में भी 8 अप्रैल 1929 की इस घटना और इस नारे का उल्लेख मिलता है।

भगत सिंह ने नारे को क्या बनाया?

यही वह मोड़ था जब “इंकलाब ज़िंदाबाद” एक नारे से बढ़कर भारत के क्रांतिकारी आंदोलन की पहचान बन गया। भगत सिंह ने अदालत को भी अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ अपने विचारों का मंच बना दिया। जेल में भी उन्होंने राजनीतिक कैदियों के अधिकारों और बेहतर व्यवहार के लिए लंबी भूख हड़ताल की।

उनकी निर्भीकता, उनके विचार और उनके मुंह से बार-बार गूंजता—

इंकलाब ज़िंदाबाद”

देश के युवाओं के दिलों में उतर गया।

भारत सरकार के ऐतिहासिक दस्तावेज़ में भी दर्ज है कि भगत सिंह के मुकदमे, उनके विचार और “इंकलाब ज़िंदाबाद” के नारे ने देशवासियों और विशेषकर युवाओं पर गहरा प्रभाव डाला।

इतिहास का सबसे बड़ा संदेश

इसलिए इतिहास को सही तरीके से समझना जरूरी है।

नारे की शुरुआत का श्रेय मौलाना हसरत मोहानी को दिया जाता है, लेकिन उसे देश के क्रांतिकारी आंदोलन में अमर पहचान देने वालों में भगत सिंह सबसे प्रमुख थे।

एक तरफ हसरत मोहानी की कलम थी…

दूसरी तरफ भगत सिंह की क्रांतिकारी आवाज़…

और इन दोनों ने मिलकर “इंकलाब ज़िंदाबाद” को ऐसा नारा बना दिया, जिसकी गूंज आज भी देश में सुनाई देती है।

यह सिर्फ एक नारा नहीं था—
यह अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ थी,
गुलामी के खिलाफ़ चुनौती थी,
और बदलाव के लिए उठी एक पुकार थी।

इंकलाब ज़िंदाबाद!
जय हिंद