कानून की दोहरी लाठी? मतीन पटेल का घर जमींदोज, पर ‘अशोक खराद’ पर मेहरबानी क्यों?
प्रतिनिधि | जलगाँव/नासिक]*
भारत का संविधान अनुच्छेद 14 के तहत ‘समानता के अधिकार’ की गारंटी देता है, लेकिन वर्तमान प्रशासनिक कार्रवाई इस संवैधानिक मूल भावना को ठेंगा दिखाती नजर आ रही है। हाल ही में टीसीएस (TCS) प्रकरण से जुड़ी निदा खान को कथित तौर पर पनाह देने के आरोप में मतीन पटेल के घर को प्रशासन ने पलक झपकते ही मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया। लेकिन वहीं दूसरी ओर, नासिक के चर्चित अशोक खरात का मामला सिस्टम की ‘दोहरी नीति’ की पोल खोल रहा है। खरात की आपत्तिजनक हरकतों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बावजूद, प्रशासन की चुप्पी कई अनसुलझे सवाल खड़े कर रही है।
मतीन पर ‘रफ्तार’, खरात पर ‘लाचारी’?
मतीन पटेल के मामले में प्रशासन ने जिस ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का परिचय दिया, वह काबिले तारीफ हो सकती थी, यदि वह सबके लिए समान होती। महज पनाह देने के आरोप में एक परिवार की छत छीन ली गई। लेकिन जनता पूछ रही है कि अशोक खरात, जिसकी संदिग्ध और विवादित गतिविधियां वीडियो के माध्यम से सार्वजनिक हो चुकी हैं, उसके खिलाफ अब तक कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या प्रशासन केवल कमजोर कड़ियों पर ही बुलडोजर चलाना जानता है?
सत्ता का ‘कवच’ या कानूनी मजबूरी?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि अशोक खरात को सत्ताधारी दलों और बड़े मंत्रियों का ‘वरदहस्त’ प्राप्त है। क्या यही वजह है कि नासिक प्रशासन खरात की अवैध संपत्तियों या उसके ठिकानों पर नोटिस चिपकाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहा है? कानूनविदों का मानना है कि यदि किसी अपराधी को संरक्षण देना अपराध है, तो समाज में अशांति और अश्लीलता (वीडियो प्रकरण के संदर्भ में) फैलाने वालों पर कार्रवाई न करना ‘मौन सहमति’ के समान है।
जनता के मन में उठते पांच तीखे सवाल:
- समान संहिता कहाँ है? क्या बुलडोजर चलाने का मापदंड व्यक्ति का नाम और उसका प्रभाव तय करता है?
- वीडियो साक्ष्य की अनदेखी क्यों? जब खरात की हरकतों के पुख्ता वीडियो वायरल हैं, तो जांच की फाइलें ठंडे बस्ते में क्यों हैं?
- प्रशासनिक भेदभाव: मतीन पटेल के मामले में जो फुर्ती दिखाई गई, वही इच्छाशक्ति ‘सफेदपोश’ आरोपियों के मामले में क्यों गायब हो जाती है?
- कानून का खौफ किसके लिए? क्या नियम केवल आम आदमी को डराने के लिए हैं, रसूखदारों को बचाने के लिए नहीं?
- न्याय का तराजू: क्या प्रशासन यह संदेश देना चाहता है कि राजनीतिक रसूख होने पर आपके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी?
संविधान और न्याय की कसौटी
लोकतंत्र में प्रशासन की विश्वसनीयता उसकी निष्पक्षता से तय होती है। यदि एक आरोपी का घर गिरता है और दूसरे को खुली छूट मिलती है, तो यह ‘न्याय’ नहीं बल्कि ‘न्याय का दमन’ है। जलगाँव और नासिक की जनता इस विरोधाभासी कार्रवाई को करीब से देख रही है।
हमारा पक्ष: लोकमत किसी भी अपराधी का समर्थन नहीं करता, लेकिन हम ‘सिलेक्टिव जस्टिस’ (चुनिंदा न्याय) के खिलाफ हैं। यदि अपराध की सजा एक है, तो अपराधी चाहे कोई भी हो, कार्रवाई भी एक समान होनी चाहिए।
